थारो म्हारो मावड़ी घणी पुराणी प्रीत | Tharo Mharo Mavdi Ghari Purari Prit

माँ दुर्गा और उनके भक्तों के बीच का प्रेम अनादि काल से चला आ रहा है। यह प्रेम किसी एक जन्म का नहीं, बल्कि अनेक जन्मों का संबंध है, जो आत्मा को माँ से जोड़ता है। “थारो म्हारो मावड़ी घणी पुराणी प्रीत” भजन इसी अनन्य भक्ति और प्रेम का सजीव चित्रण करता है, जहाँ भक्त माँ को अपने जीवन का आधार मानकर उनकी कृपा का गुणगान करता है। यह भजन हमें माँ के प्रति अपनी भक्ति को और अधिक प्रगाढ़ करने की प्रेरणा देता है।

Tharo Mharo Mavdi Ghari Purari Prit

थारो म्हारो मावड़ी,
घणी पुराणी प्रीत,
केड आवां तो लागे है-2,
जईयां आग्या म्हे तो पीर,
थारो म्हारों मावडी,
घणी पुराणी प्रीत।1।

जठै जठै मैं चालूँ मावड़ी,
थे तो फूल बिछाओ हो,
जी कानी मैं देखूँ मावड़ी,
नजर मन्ने थे ही आओ,
मिलतो रवे दादी म्हाने-2,
इक थारो प्यार दुलार,
थारो म्हारों मावडी,
घणी पुराणी प्रीत।2।

सासरिये में चिंता मावड़ी,
केड में आराम है,
पिहरिये के लाड में दादी,
बीते चारों याम है,
म्हारे सासरिये में सगला-2,
सब जावण केड तैयार,
थारो म्हारों मावडी,
घणी पुराणी प्रीत।3।

थारी किरपा से ही ‘मधु को,
हरयो भरयो परिवार है,
थारो जवाईं भी म्हारी दादी,
करे थारी मनुहार है,
थारा टाबरिया भी दादी-2,
बस करै थाने ही याद,
थारो म्हारों मावडी,
घणी पुराणी प्रीत।4।

विदा होने की जब घड़ी आवे,
हिवड़ो भर-भर जावे है,
आंख्या का पानी मोती बन,
चरणां में चढ़ जावे है,
मन्ने हिवड़े लगाकर दादी-2,
बोली आती रहिज्ये पीर,
थारो म्हारों मावडी,
घणी पुराणी प्रीत।5।

थारो म्हारो मावड़ी,
घणी पुराणी प्रीत,
केड आवां तो लागे है-2,
जईयां आग्या म्हे तो पीर,
थारो म्हारों मावडी,
घणी पुराणी प्रीत।6।

माँ का प्रेम निरंतर प्रवाहित होने वाली उस अमृतधारा की तरह है, जो हर भक्त को संबल और शांति प्रदान करती है। थारो म्हारो मावड़ी घणी पुराणी प्रीत भजन हमें यह एहसास कराता है कि माँ और भक्त का संबंध जन्म-जन्मांतरों का है। यदि यह भजन आपके हृदय में माँ के प्रति प्रेम और श्रद्धा को और गहरा कर देता है, तो “मेरे घर आई माँ खुशियों का सागर लायी माँ” भजन भी अवश्य करे, जिसमें माँ के आशीर्वाद और उनकी अनुकंपा का सुंदर वर्णन किया गया है।

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