जीवन में सच्चा ज्ञान और मुक्ति केवल गुरु की पहचान और उनकी शरण में जाने से ही संभव है। “गुरु को ना पहचान सका तो जग जाना तो जाना क्या” भजन इसी गहरे सत्य को प्रकट करता है कि यदि कोई व्यक्ति इस संसार के सारे रहस्यों को जान भी ले, लेकिन गुरु का महत्व न समझे, तो वह वास्तव में कुछ भी नहीं जान पाया। इस भजन को पढ़ने या करने से हमें गुरु भक्ति का सही अर्थ समझने की प्रेरणा मिलती है।
Guru Ko Na Pahchan Saka To Jag Jana To Jana Kya
गुरु को ना पहचान सका तो,
जग जाना तो जाना क्या,
धन दौलत तू पा भी लिया गर,
धन दौलत तू पा भी लिया गर,
चैन नहीं पाया तो क्या,
गुरु को न पहचान सका तो,
जग जाना तो जाना क्या।।
बाहर आडम्बर कुछ है,
भीतर रूप ना निखारा है,
गुरु गुरु में शिष्य गुरु में,
गुरु बनने का झगड़ा है,
ऐसे गुरु भला बोलो क्या,
शिष्य को राह दिखाएगा,
गुरु को न पहचान सका तो,
जग जाना तो जाना क्या।।
कहलाने को भक्त बहुत है,
लेकिन खोटा धंधा है,
माया ऐसे घेर लिया है,
रहते आँख भी अँधा है,
ऐसे भक्तो को प्रभु का दर्शन,
कहो कैसे हो पाएगा,
गुरु को न पहचान सका तो,
जग जाना तो जाना क्या।।
डाल पकड़ कर झूल रहा है,
दुख का कहाँ निवारण है,
जगत गुरु को भूल ही जाना,
सभी दुखों का कारण है,
सोच समझ कर गुरु करो तुम,
नही तो धोखा खाएगा,
गुरु को न पहचान सका तो,
जग जाना तो जाना क्या।।
जो करना वो खुद ही करना,
ना कहना नाइंसाफी है,
भजन में शब्द नही है काफी,
भाव का होना काफी है,
गाया नही गुरु का महिमा,
राग रसीला गाया क्या,
गुरु को न पहचान सका तो,
जग जाना तो जाना क्या।।
गुरु को ना पहचान सका तो,
जग जाना तो जाना क्या,
धन दौलत तू पा भी लिया गर,
धन दौलत तू पा भी लिया गर,
चैन नहीं पाया तो क्या,
गुरु को न पहचान सका तो,
जग जाना तो जाना क्या।।
गुरु का सान्निध्य और उनका मार्गदर्शन ही जीवन का सबसे बड़ा वरदान है। जो व्यक्ति गुरु की महिमा को समझ लेता है, वही सच्चे ज्ञान की प्राप्ति करता है। यदि यह भजन आपको आध्यात्मिक प्रेरणा देता है, तो “गुरु की महिमा कोई ना जाने”, “गुरुवर मेरी ओर अपनी नजरिया रखियो”, “गुरुदेव मेरे गुरुदेव मेरे” और “जब सिर पे गुरु जी का हाथ फिर मन तोहे चिंता काहे की” जैसे अन्य भजनों को भी पढ़ें और गुरु भक्ति के मार्ग पर आगे बढ़ें।