सूर्य ग्रहण : साल का दूसरा ग्रहण कब लगेगा

सूर्य ग्रहण, एक ऐसा पल होता है जब ब्रह्मांड की शक्तियाँ मानो कुछ कहना चाहती हैं। यह घटना पूरी दुनिया में एक विशेष महत्व रखती है, क्योंकि इसके वैज्ञानिक कारण के साथ-साथ धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व भी है। तो हम आपको बताते है की Surya Grahan क्यों होता है, कैसे होता है, इसका महत्त्व और इसके दौरान क्या करणा चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए की सम्पूर्ण जानकारी-

सूर्य ग्रहण 2025

सूर्य ग्रहण क्या है और यह क्यों होता है ?

सूर्य पर ग्रहण तब होता है जब चंद्रमा सूर्य और पृथ्वी के बीच आ जाता है, जिससे सूर्य की रोशनी पृथ्वी तक नहीं पहुँच पाती। इस दौरान सूर्य की पूरी या आंशिक छाया होती है, जिसे हम ग्रहण के रूप में देखते हैं। यह एक प्राकृतिक और खगोलीय घटना है, जो आमतौर पर कुछ सालों में एक या दो बार होती है।

यह तीन प्रकार का होता है-

  1. Total Solar Eclipse – जब चंद्रमा पूरी तरह से सूर्य को ढक लेता है।
  2. Partial Solar Eclipse – जब सूर्य का कुछ हिस्सा ही ढकता है।
  3. Annular Solar Eclipse – जब चंद्रमा सूर्य के बीच में तो आता है लेकिन उसका व्यास छोटा होने से सूर्य का किनारा एक रिंग की तरह दिखता है।

साल का दूसरा Surya Grahan कब लगेगा?

साल 2025 का पहला Surya Grahan 29 मार्च को लगा था, जो कि भारत में दृश्य नहीं था। अब भक्तजन और खगोल प्रेमी उत्सुक हैं कि साल का दूसरा ग्रहण कब लगेगा और क्या यह भारत में दिखाई देगा या नहीं। तो आपको बता दें कि साल का दूसरा ग्रहण 21 सितंबर 2025 को लगेगा, लेकिन यह भी भारत में नजर नहीं आएगा। इसलिए इस दिन सूतक काल मान्य नहीं होगा, और धार्मिक दृष्टि से कोई विशेष सावधानियां भारत में आवश्यक नहीं हैं।

यह ग्रहण मुख्य रूप से न्यूजीलैंड, फिजी, अंटार्कटिका और ऑस्ट्रेलिया के दक्षिणी हिस्सों में देखा जा सकेगा। हालांकि भारत में यह दृश्य नहीं होगा, फिर भी यह खगोलीय घटना एक बार फिर ब्रह्मांड के अद्भुत संतुलन और सौरमंडल की महिमा को प्रकट करती है।

ग्रहण के वैज्ञानिक कारण

सूर्य पर ग्रहण तब होता है जब चंद्रमा और सूर्य एक ही रेखा में होते हैं और चंद्रमा सूर्य को पूरी तरह से या आंशिक रूप से ढक लेता है। यह घटना तब घटती है जब चंद्रमा का आकार सूरज के आकार से कम होता है, लेकिन फिर भी वह सूर्य को कुछ समय के लिए पूरी तरह ढक लेता है। यह खगोलीय घटना Solar Eclipse के नाम से जानी जाती है। ग्रहण की गति और समय पर बहुत सारी गणनाएँ की जाती हैं, ताकि यह जाना जा सके कि कब और कहाँ यह घटना घटेगी।

इसका धार्मिक कारण: राहु-केतु और अमृत की कहानी

सूर्य पर ग्रहण से जुड़ी एक अत्यंत प्रसिद्ध और रोचक कथा समुद्र मंथन से जुड़ी हुई है, जिसका उल्लेख विष्णु पुराण और भागवत पुराण में मिलता है।

प्राचीन समय की बात है जब देवताओं और असुरों ने मिलकर समुद्र मंथन किया, जिससे अमृत निकल सके। मंथन के दौरान जब भगवान धन्वंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए, तो अमृत पाने के लिए दोनों पक्षों में भारी विवाद छिड़ गया। अमृत को लेकर असुरों ने बलपूर्वक अधिकार जताया, लेकिन भगवान विष्णु ने देवताओं की रक्षा के लिए मोहिनी रूप धारण किया — एक अत्यंत सुंदर स्त्री का स्वरूप।

मोहिनी रूप में भगवान ने चालाकी से असुरों को बहलाया और अमृत वितरण की जिम्मेदारी अपने हाथ में ले ली। वे अमृत केवल देवताओं को देने लगे। लेकिन असुरों में से एक चालाक असुर जिसका नाम स्वरभानु था, वह देवता का वेश बनाकर चुपचाप देवताओं की पंक्ति में बैठ गया और अमृत पीने में सफल हो गया।

जैसे ही सूर्य देव और चंद्र देव ने इस छल को पहचाना, उन्होंने तुरंत भगवान विष्णु को इसकी सूचना दी। भगवान विष्णु ने बिना देर किए सुदर्शन चक्र चलाकर स्वरभानु का सिर धड़ से अलग कर दिया।

लेकिन चूंकि वह कुछ मात्रा में अमृत पी चुका था, इसलिए वह मर नहीं सका। उसका सिर राहु और धड़ केतु के रूप में अमर हो गया। तभी से राहु और केतु को सूर्य और चंद्रमा से शत्रुता हो गई। मान्यता है कि जब भी राहु या केतु क्रोधित होते हैं, तो वे सूर्य या चंद्रमा को “ग्रस” लेते हैं — और यही क्षण होता है जिसे हम ग्रहण कहते हैं।

यदि आप सूर्य भगवान से जुड़ी और जानकारी चाहते हैं, तो आप हमारे अन्य लेखों “सूर्य देव मंत्र ” और “सूर्य चालीसा ” को भी पढ़ सकते हैं। इन लेखों में आपको इस खगोलीय घटना से जुड़ी और महत्वपूर्ण जानकारी मिल सकती है, जो आपके जीवन में उपयोगी हो सकती है।

इसमें क्या न करें?

हिन्दू धर्म में इस समय कुछ कार्यों से परहेज़ करने की सख्त सलाह दी गई है। आइए जानते हैं ग्रहण में किन बातों से बचना चाहिए और क्यों:

  • भोजन और पानी: ग्रहण के समय वातावरण में सूक्ष्म जीवाणु सक्रिय होते हैं और इस समय पाचन शक्ति भी कमजोर मानी जाती है, इसलिए ग्रहण में भोजन और पानी का सेवन नहीं करना चाहिए।
  • गर्भवती महिलाएं: गर्भवती महिलाएं ऐसे में बाहर न निकलें। माना जाता है कि ग्रहण की किरणें गर्भस्थ शिशु को प्रभावित कर सकती हैं इसलिए उसमे विकृति या दोष की आशंका से बचाव हेतु यह परहेज करना आवश्यक है।
  • पूजा-पाठ: ग्रहण काल को अशुद्ध माना जाता है, जिससे मूर्तियों की सात्त्विकता पर प्रभाव पड़ सकता है, इसलिए पूजा-पाठ या मूर्ति को स्पर्श न करें। मंदिरों के कपाट भी इस समय बंद कर दिए जाते हैं।
  • क्रोध, नकारात्मक: ग्रहण काल में मानसिक ऊर्जा संवेदनशील होती है, जिससे बुरे विचारों और शब्दों का असर बढ़ जाता है, इसलिए क्रोध, नकारात्मक सोच और कटु वचन बोलने से बचें।
  • नुकीली चीजों का प्रयोग न करें: विशेष रूप से गर्भवती महिलाओं के लिए यह परहेज बताया गया है। शारीरिक और ऊर्जात्मक चोट से बचाव का प्रतीक है।
  • नाखून और बाल न काटें: शरीर को ग्रहण काल में अशुद्ध माना जाता है इसलिए यह समय शरीर को छेड़छाड़ से बचाने का होता है।
  • ग्रहण को न देखें: सूर्य की किरणें इस समय हानिकारक हो सकती हैं, इसलिए इसे देखने के लिए हमेशा Solar Eclipse Viewing Glasses या प्राकृतिक प्रतिबिंब (reflection) का प्रयोग करें।
  • भोजन को न खाएं: ग्रहण से पहले बनाए गए भोजन को ग्रहण के बाद फेंकना या दान करना उचित होता है, लेकिन ग्रहण से पहले भोजन में तुलसी पत्र डालना भोज को बचाने का अच्छा उपाय माना गया है।

ग्रहण के समय जिन बातों से बचना बताया गया है, वे केवल परंपरा नहीं बल्कि अनुभवजन्य ज्ञान और आध्यात्मिक चेतना से जुड़ी सलाह हैं। जब हम इन बातों का पालन करते हैं, तो ग्रहण का प्रभाव हमारे जीवन में सकारात्मक रूप से दिखाई देता है।

ग्रहण में क्या करना चाहिए?

  • ग्रहण के दौरान धार्मिक दृष्टि से कुछ विशेष कार्य करना अत्यंत शुभ माना गया है, जैसे:
  • सूर्य मंत्र और शिव मंत्र का जाप करें – जैसे “ॐ सूर्याय नमः“, “ॐ नमः शिवाय” आदि।
  • ग्रहण शुरू होने से पहले स्नान करें और शुद्ध वस्त्र पहनें
  • पूजा स्थान और घर में गंगाजल का छिड़काव करें।
  • तुलसी के पत्तों को भोजन और पानी में डालकर रख दें, ताकि वो दूषित न हों।
  • ग्रहण समाप्त होने पर फिर से स्नान करें और अपने शरीर को शुद्ध करें।
  • ब्राह्मणों, ज़रूरतमंदों, या गौशाला में दान दें – जैसे अन्न, वस्त्र, तिल आदि।
  • ग्रहण के बाद पूरे घर की सफाई करें और सकारात्मक ऊर्जा के लिए भजन या शंख ध्वनि करें।

FAQ

ग्रहण में खाना क्यों नहीं खाया जाता?

इस समय नकारात्मक ऊर्जा सक्रिय होती है और पाचन शक्ति कमजोर होती है, इसलिए भोजन वर्जित होता है।

इसको देखने से क्या नुकसान होता है?

क्या ग्रहण में भगवान की पूजा कर सकते हैं?

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