Aadi Yogi
दूर उस, आकाश की, गहराइयों में,,,
इक नदी से, बह रहे हैं, आदि योगी l
शून्य सन्नाटे, टपकते जा रहे हैं,,,
मौन से, सब कह रहे हैं, आदि योगी l
योग के इस, स्पर्श से अब,
योगमय, करना है तन मन,,,
सांस शाश्वत, सनन सननन,
प्राण गुंजन, धनन धननन l
उतरें मुझ में, आदि योगी l
योग धारा, छलक छन्न छन्न l
सांस शाश्वत, सनन सननन l
प्राण गुंजन, धनन धननन l
उतरें मुझ में, आदि योगी ll
पीस दो, अस्तित्व मेरा,
और कर दो, चूरा चूरा l
पूर्ण होने, दो मुझे और,
होने दो अब, पूरा पूरा l
भस्म वाली, रस्म कर दो, आदि योगी l
योग उत्सव, रंग भर दो, आदि योगी l
बज उठे ये, मन सितारी,
झनन, झननन, झनन, झननन l
“सांस शाश्वत, सनन सननन,
प्राण गुंजन, धनन धननन” ll
उतरें मुझ में, आदि योगी l
योग धारा, छलक छन्न छन्न,
सांस शाश्वत, सनन सननन,
प्राण गुंजन, धनन धननन l
उतरें मुझ में, आदि योगी ll

मैं पंडित सत्य प्रकाश, सनातन धर्म का एक समर्पित साधक और श्री राम, लक्ष्मण जी, माता सीता और माँ सरस्वती की भक्ति में लीन एक सेवक हूँ। मेरा उद्देश्य इन दिव्य शक्तियों की महिमा को जन-जन तक पहुँचाना और भक्तों को उनके आशीर्वाद से जोड़ना है। मैं अपने लेखों के माध्यम से इन महान विभूतियों की कथाएँ, आरती, मंत्र, स्तोत्र और पूजन विधि को सरल भाषा में प्रस्तुत करता हूँ, ताकि हर भक्त अपने जीवन में इनकी कृपा का अनुभव कर सके।जय श्री राम View Profile