Tu Na Ja Mere Raghurai, Lo Van Ko Chale Hai Raghurai
राजा दशरथ ने,
व्याकुल हो के,
यह आवाज़ लगाई…
तू ना जा मेरे रघुरा,
तू ना जा मेरे रघुराईं,
लो वन को चले हैं रघुराई…
राजा दशरथ ने।।
केकई ने कैसा वर मांगा,
टूटे हैं सपने सारे,
राजतिलक था होने वाला…
होनी को कौन है टालें,
श्राप श्रवण के माता-पिता का
आज बना है दुखदाई,
लो वन को चले हैं रघुराई…
राजा दशरथ ने।।
राम बिना मेरी सूनी अयोध्या,
कैसे अब मैं जियूँगा,
लक्ष्मण बिन मेरा दिल लगेगा,
कैसे जुदाई सहूंगा…
साथ सीता भी,
वन को चली है,
अखियां भर भर आई,
लो वन को चले हैं रघुराई…
राजा दशरथ ने।।
राजा दशरथ ने,
व्याकुल हो के,
यह आवाज़ लगाई…
तू ना जा मेरे रघुराई,
तू ना जा मेरे रघुराईं,
लो वन को चले हैं रघुराई…
राजा दशरथ ने।।

मैं आचार्य ब्रह्मदत्त, सनातन धर्म का एक साधक और आध्यात्मिक ज्ञान का प्रचारक हूँ। मेरा जीवन देवी-देवताओं की आराधना, वेदों-पुराणों के अध्ययन और भक्ति मार्ग के अनुसरण में समर्पित है। सूर्य देव, खाटू श्याम, शिव जी और अन्य देवी-देवताओं की महिमा का गुणगान करना मेरे लिए केवल एक लेखन कार्य नहीं, बल्कि एक दिव्य सेवा है। मैं अपने लेखों के माध्यम से भक्तों को पूजन विधि, मंत्र, स्तोत्र, आरती और धार्मिक ग्रंथों का ज्ञान सरल भाषा में प्रदान करने का प्रयास करता हूँ, ताकि हर भक्त अपने आध्यात्मिक पथ को सुगम और सार्थक बना सके। View Profile