बनारस, काशी, वाराणसी इस नगरी के जितने नाम हैं, उतने ही रंग और रस भी। लेकिन जो चीज़ इसे सबसे खास बनाती है, वो हैं बनारस गंगा घाट । यहाँ के घाटों पर कदम रखते ही आपको ऐसा लगेगा मानो समय थम गया हो। आइये हम आपको प्रसिद्ध और सुन्दर Banaras Ganga Ghat के बारे में बताते है-
7 Femous Banaras Ganga Ghat
- दशाश्वमेध घाट
- अस्सी घाट: शांति का संगम
- नामो घाट
- राज घाट (वाराणसी)
- ललिता घाट (वाराणसी)
- हरिश्चंद्र घाट
- मणिकर्णिका घाट
1. दशाश्वमेध घाट
बनारस गंगा घाट में सबसे प्राचीन और प्रमुख घाट है दशाश्वमेध घाट । यह घाट काशी विश्वनाथ मंदिर के पास स्थित है और यहाँ हर शाम होने वाली गंगा आरती इसे विश्व प्रसिद्ध बनाती है।

धार्मिक महत्व
‘दश + अश्व + मेध’ का अर्थ है – दस घोड़ों की आहुति द्वारा किया गया यज्ञ।
पौराणिक मान्यता है कि भगवान ब्रह्मा ने यहाँ भगवान शिव का स्वागत करने के लिए दश अश्वमेध यज्ञ किया था।
इस घाट को दिव्य और शक्ति से भरपूर माना जाता है।
क्या बनाता है इसे खास?
शाम की गंगा आरती: हर दिन सूर्यास्त के समय, 7 पंडितों द्वारा एक साथ दीयों, घंटियों और मंत्रों के साथ भव्य आरती होती है। यह अनुभव भक्तों के लिए अविस्मरणीय होता है।
- नाव से दृश्य: आरती को नाव से देखना एक अलग ही अनुभव देता है – शांत जल पर आरती की रोशनी झलकती है।
- स्नान और पूजा: यह घाट पवित्र स्नान और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए सबसे प्रमुख स्थान है।
गंगा आरती का समय
- गर्मी में: शाम 7:00 बजे
- सर्दी में: शाम 6:30 बजे
(सुबह आरती भी होती है – लगभग 4:30 से 5:00 बजे तक)
कैसे पहुँचें?
- स्थान: गोदौलिया चौराहा से कुछ ही दूरी पर स्थित है दशाश्वमेध घाट।
- कैसे जाएं: गोदौलिया से पैदल जाना सबसे बेहतर है क्योंकि वहाँ वाहनों की एंट्री सीमित होती है।
निकटतम पार्किंग और ई-रिक्शा सुविधा भी उपलब्ध है।
दशाश्वमेध घाट सिर्फ एक Kashi Banaras Ganga Ghat नहीं, बल्कि काशी की आत्मा है — यहाँ हर दिन गंगा के किनारे श्रद्धा, भक्ति और शांति की अनूठी तस्वीर बनती है।
2. अस्सी घाट: शांति का संगम
अस्सी घाट वाराणसी का सबसे दक्षिणी और लोकप्रिय घाट है। यह वह स्थान है जहाँ पौराणिक कथा के अनुसार, देवी दुर्गा ने असि नदी के पास शुम्भ-निशुम्भ नामक राक्षसों का वध किया था। यह घाट खासकर युवा, साधकों, पर्यटकों और कला-संस्कृति प्रेमियों के बीच बेहद लोकप्रिय है।

क्यों खास है अस्सी घाट?
- हर सुबह यहाँ ‘Subah-e-Banaras’ कार्यक्रम होता है जिसमें योग, शास्त्रीय संगीत, गंगा आरती और ध्यान का संगम होता है।
- यह सुबह की शुरुआत को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर देता है।
- घाट पर योग सत्र, स्थानीय कलाकारों की प्रस्तुति और विदेशी साधकों की मौजूदगी घाट को वैश्विक रंग देती है।
गंगा आरती का समय
- सुबह आरती: सुबह 4:30 से 5:30 बजे तक
कैसे पहुँचे?
- स्थान: अस्सी चौराहा से कुछ ही कदमों की दूरी पर स्थित है अस्सी घाट।
- कैसे जाएं: BHU (बनारस हिंदू विश्वविद्यालय) से करीब 1.5 किमी दूर, ऑटो, ई-रिक्शा और बाइक से आसानी से पहुँचा जा सकता है।
यहाँ तक पैदल चलना भी बेहद सुखद होता है, खासकर सुबह-सुबह।
अस्सी घाट की ख़ास बातें
घाट की सीढ़ियों पर बैठकर चाय पीना, गिटार बजाना या घाट की दीवारों पर लिखी कविता पढ़ना — अस्सी घाट पर समय बिताने का हर तरीका यादगार बन जाता है।
अस्सी घाट उस बनारस को दर्शाता है जहाँ हर कोई खुद को खोजने आता है — चाहे वो विद्यार्थी हो, साधक हो, या पर्यटक।
3. नामो घाट: अद्भुत दर्शनीय स्थल
नमो घाट को पहले खिड़किया घाट कहा जाता था, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रयासों से इसका नवीनीकरण हुआ और इसे नया रूप, नया नाम मिला – NAMO Ghat।
“नमो” शब्द प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम का संक्षिप्त रूप होने के साथ-साथ “नम:” यानी नमस्कार का भी संकेत देता है, जिससे यह घाट भारतीयता और स्वागत की भावना को दर्शाता है।

कैसे पहुँचें?
- स्थान: नामो घाट, खिड़किया क्षेत्र, राजघाट पुल के पास स्थित है।
- रेल द्वारा: वाराणसी जंक्शन या बनारस स्टेशन से ऑटो या टैक्सी से आसानी से पहुँच सकते हैं।
- स्थानीय पहुँच: ई-रिक्शा, बाइक या पैदल चलकर भी घाट तक पहुँचना आसान है।
क्या बनाता है NAMO Ghat को खास?
- तीन विशाल हाथ जोड़ती हुईं प्रतिमाएं – ये ‘नमस्ते’ की मुद्रा में बनी प्रतिमाएं घाट का प्रमुख आकर्षण हैं, जो दूर से ही नज़र आती हैं।
- नाव पर्यटन और क्रूज़ सुविधा – यह घाट क्रूज़ टर्मिनल के रूप में भी विकसित किया गया है।
- प्रॉमनेड और वॉकिंग ट्रैक – मॉर्निंग वॉक, योग या गंगा के किनारे शांति से बैठने के लिए आदर्श जगह।
- खुला मंच (ओपन एम्फीथिएटर) – सांस्कृतिक कार्यक्रम और गंगा महोत्सव जैसी गतिविधियों के लिए इस्तेमाल होता है।
- विकलांग और बुज़ुर्गों के लिए सुविधा संपन्न ढांचा – लिफ्ट, रैंप और स्वच्छ टॉयलेट्स सहित।
नामो घाट की वास्तुकला और भव्यता इसे फोटोग्राफरों और सोशल मीडिया प्रेमियों के बीच बहुत लोकप्रिय बनाती है. सुबह-सुबह सूर्य की रोशनी में यहाँ की “नमस्ते प्रतिमाएं” बेहद सुंदर लगती हैं।
4. राज घाट (वाराणसी) – इतिहास और अध्यात्म का मिलन स्थल।
राज घाट वाराणसी के उत्तर भाग में स्थित एक ऐतिहासिक घाट है, जो गंगा नदी के तट पर स्थित है। यह घाट गंगा और वरुणा नदी के संगम के नज़दीक है और इसे प्राचीन काशी के प्रवेश द्वार के रूप में भी जाना जाता है। यह घाट बनारस के कम प्रसिद्ध लेकिन ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण घाटों में से एक है।

ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व
- यह घाट काशी के प्राचीनतम क्षेत्रों में आता है और कहा जाता है कि यहीं पर पुरातन समय में कई धार्मिक आयोजन होते थे।
- यह घाट काशी की पुरानी नगर सीमा के निकट है, जिसे ‘राजा काशी‘ के समय से जाना जाता रहा है।
- पास में स्थित है राज घाट किला (राजा चेत सिंह किला) जो इतिहास प्रेमियों के लिए आकर्षण का केंद्र है।
कैसे पहुँचे?
- स्थान: यह घाट मालवीय पुल के पास स्थित है, जो गंगा नदी पर बना है।
- कैसे जाएं: वाराणसी रेलवे स्टेशन से ऑटो, टैक्सी या पैदल मार्ग से पहुँचा जा सकता है। यह घाट बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) से भी दूरी पर है।
क्या है खास
- यहाँ से गंगा का दृश्य बहुत विस्तृत और शांतिपूर्ण होता है।
- घाट के आसपास की गलियाँ और पुरानी इमारतें आपको काशी की प्राचीन आत्मा से जोड़ती हैं।
- घाट के नज़दीक आपको पुरातात्विक खुदाई के अवशेष भी देखने को मिल सकते हैं, जो काशी की ऐतिहासिक गहराई को दर्शाते हैं।
राज घाट के पास से ही गंगा नदी बनारस के केंद्र से बहती है, और यहाँ से काशी की बनावट और घाटों की परिक्रमा आरंभ होती है। अगर आप काशी को उसके मूल, उसकी जड़ों से जानना चाहते हैं — तो राज घाट एक शानदार शुरुआत हो सकता है।
5. ललिता घाट (वाराणसी) – काशी का ऐतिहासिक घाट
ललिता घाट की स्थापना नेपाल के राजा रणवीर शाह ने की थी। उन्होंने इस घाट पर पशुपतिनाथ मंदिर का निर्माण भी करवाया, जो नेपाल के काठमांडू स्थित मूल पशुपतिनाथ मंदिर की प्रतिकृति है। यह घाट धार्मिक, सांस्कृतिक और वास्तुकला की दृष्टि से बेहद खास है।

घाट का नाम देवी ललिता के नाम पर रखा गया है, जो शक्ति की एक रूपा हैं। यहाँ आकर गंगा के किनारे बैठना एक आध्यात्मिक अनुभव देता है।
कैसे पहुँचें?
- स्थान: ललिता घाट, मणिकर्णिका घाट और मीर घाट के बीच स्थित है।
- कैसे जाएं: गोदौलिया चौराहे से पैदल चलते हुए या नाव के ज़रिए आसानी से पहुँचा जा सकता है।
क्या है खास ललिता घाट में?
- पशुपतिनाथ मंदिर: नेपाली शैली में बना यह मंदिर लकड़ी की नक्काशी और कलात्मकता का अद्भुत उदाहरण है।
- कम भीड़, अधिक शांति: दशाश्वमेध जैसे भीड़भाड़ वाले घाटों से अलग, यहाँ आप गंगा को शांति से निहार सकते हैं।
- ध्यान और साधना: यहाँ सुबह के समय कई साधु और साधक ध्यान में लीन दिखाई देते हैं।
यदि आप एक फोटोग्राफर या संस्कृति प्रेमी हैं, तो ललिता घाट पर सुबह-सुबह या सूरज डूबने के समय आना सबसे बढ़िया रहेगा। यहाँ की रोशनी, मंदिर की वास्तुकला और शांत वातावरण आपको मंत्रमुग्ध कर देगा।
6. हरिश्चंद्र घाट– मोक्ष की अंतिम सीढ़ी
हरिश्चंद्र घाट वाराणसी के दो प्रमुख श्मशान घाटों में से एक है दूसरा है मणिकर्णिका घाट। इस घाट का नाम राजा हरिश्चंद्र के नाम पर रखा गया है – जो सत्य और धर्म के प्रतीक माने जाते हैं।

पौराणिक कथा के अनुसार, राजा हरिश्चंद्र ने अपने सत्य व्रत के पालन में काशी में एक चांडाल के यहाँ नौकरी की और स्वयं अपने पुत्र का अंतिम संस्कार किया था। यही उनकी तपस्या की भूमि थी, और इसी वजह से यह घाट आज त्याग, सत्य और मोक्ष का प्रतीक बन चुका है।
धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व
- यहाँ यह मान्यता है कि जो व्यक्ति हरिश्चंद्र घाट पर अंतिम संस्कार के बाद गंगा में प्रवाहित होता है, उसे मोक्ष प्राप्त होता है।
- कई साधु और संन्यासी यहाँ अंतिम समय में आकर बसते हैं ताकि उनकी मुक्ति इसी घाट पर हो।
कैसे पहुँचे?
- स्थान: यह घाट दशाश्वमेध और अस्सी घाट के बीच स्थित है।
- कैसे जाएं: गोदौलिया से पैदल या नाव के ज़रिए पहुँचना आसान है।
प्रमुख बातें
- चिता हमेशा जलती रहती है – यहाँ भी मणिकर्णिका घाट की तरह शवदाह 24 घंटे होता है।
- घाट पर दहन के लिए विद्युत शवदाह गृह भी बनाया गया है, जिससे पर्यावरण के संतुलन को ध्यान में रखा जा सके।
- यहाँ की शांति, seriousness और भक्ति का वातावरण आपको भीतर तक झकझोर देता है।
अगर आप वाराणसी को उसकी आध्यात्मिक गहराई से समझना चाहते हैं — तो हरिश्चंद्र घाट पर जाना आपके अनुभव को पूर्ण बना देगा।
7. मणिकर्णिका घाट: मोक्ष का द्वार
मणिकर्णिका घाट वाराणसी (काशी) का सबसे पवित्र और ऐतिहासिक घाट है, जिसे “मोक्ष का द्वार” भी कहा जाता है। यह वह स्थान है जहाँ जीवन और मृत्यु एक साथ सांस लेते हैं, जहाँ हर दिन अंत्येष्टि होती है, लेकिन वह भी एक मुक्ति का उत्सव बन जाती है।

नाम का रहस्य – ‘मणिकर्णिका’ क्यों कहा जाता है?
पुराणों के अनुसार, जब भगवान शिव और माता पार्वती काशी भ्रमण पर आए, तो माता पार्वती का कर्णफूल (कर्णिका) इस स्थान पर गिर गया। तभी से इसका नाम “मणिकर्णिका” पड़ा। कहा जाता है कि शिव ने यहाँ एक कुण्ड भी बनाया — मणिकर्णिका कुंड, जो आज भी मौजूद है।
कैसे पहुँचें?
- स्थान: वाराणसी के गोदौलिया से करीब 1.5 किमी दूर, पैदल मार्ग।
- नजदीकी रेलवे स्टेशन: वाराणसी जंक्शन (BSB), वहाँ से ऑटो/रिक्शा से गोदौलिया तक जाएँ, फिर पैदल।
क्या देखने को मिलता है यहाँ?
- दिन-रात जलती चिताएँ — यह अकेला घाट है जहाँ 24×7 अंतिम संस्कार होता है।
- साधुओं की उपस्थिति, मंत्रोच्चारण, लकड़ियों की ढेर और गंगा की चुपचाप बहती धारा — सब कुछ एक गूढ़ वातावरण रचते हैं।
- पास ही स्थित है महाश्मशान नाथ मंदिर, जहाँ मृत्यु के देवता महाकाल की उपासना होती है।
यह घाट मृत्यु के बाद मोक्ष का प्रतीक है, जहाँ अंतिम संस्कार की पवित्र परंपरा अनंत काल से चल रही है। यह जीवन और मृत्यु के रहस्य का साक्षी है।
Banaras Ganga Ghat केवल एक घाट नहीं, बल्कि एक जीवन दर्शन है। यहाँ हर लहर में संगीत है, हर दीया में उम्मीद, और हर पत्थर में इतिहास छुपा है। काशी के घाट वो जगह हैं जहाँ दुनिया थमती है, और आत्मा चल पड़ती है।
FAQ
वाराणसी में गंगा आरती कहाँ होती है?
सबसे प्रमुख गंगा आरती दशाश्वमेध घाट पर होती है। इसके अलावा अस्सी घाट पर सुबह की ‘सुबह-ए-बनारस’ आरती भी प्रसिद्ध है।
कौन से घाट पर शवदाह होता है?
मणिकर्णिका घाट और हरिश्चंद्र घाट – ये दोनों श्मशान घाट हैं जहाँ 24×7 अंतिम संस्कार होते हैं।
वाराणसी में घूमने का सबसे अच्छा समय कौन सा है?
अक्टूबर से मार्च तक का समय सबसे अच्छा होता है, जब मौसम सुहावना होता है और धार्मिक आयोजन भी अधिक होते हैं।

मैं श्रुति शास्त्री , एक समर्पित पुजारिन और लेखिका हूँ, मैं अपने हिन्दू देवी पर आध्यात्मिकता पर लेखन भी करती हूँ। हमारे द्वारा लिखें गए आर्टिकल भक्तों के लिए अत्यंत उपयोगी होते हैं, क्योंकि मैं देवी महिमा, पूजन विधि, स्तोत्र, मंत्र और भक्ति से जुड़ी कठिन जानकारी सरल भाषा में प्रदान करती हूँ। मेरी उद्देश्य भक्तों को देवी शक्ति के प्रति जागरूक करना और उन्हें आध्यात्मिक ऊर्जा से ओतप्रोत करना है।View Profile