हिंदू धर्म में माता अन्नपूर्णा को अन्न व समृद्धि की देवी माना जाता है। अन्नपूर्णा स्तोत्रम् एक अत्यंत प्रभावशाली स्तुति है, जो भगवान आदि शंकराचार्य द्वारा रचित मानी जाती है। Annapurna Stotram में देवी की महिमा का वर्णन करते हुए उन्हें अन्न व परिपूर्णता की अधिष्ठात्री बताया गया है। इस स्तोत्र के पाठ से न केवल अन्नपूर्णा देवी की कृपा प्राप्त होती है, बल्कि यह भक्ति, श्रद्धा और आत्मसमर्पण का भी प्रतीक है।
यह स्तोत्र भक्तों को यह सिखाता है कि जीवन में अन्न का महत्व केवल शारीरिक पोषण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आध्यात्मिक उन्नति का भी एक माध्यम है। ऐसा विश्वास है कि जो व्यक्ति श्रद्धा और भक्ति से अन्नपूर्णा स्तोत्रम् का पाठ करता है, उसे जीवन में किसी प्रकार का अभाव नहीं रहता। हमने आपके सुविधा के लिए Annapurna Stotram Lyrics नीचे उपलब्ध कराया है-
Annapurna Stotram
नित्यानन्दकरी वराभयकरी सौन्दर्यरत्नाकरी,
निर्धूताखिलघोरपावनकरी प्रत्यक्षमाहेश्वरी॥
प्रालेयाचलवंशपावनकरी काशीपुराधीश्वरी,
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥1॥
नानारत्नविचित्रभूषणकरी हेमाम्बराडम्बरी,
मुक्ताहारविलम्बमानविलसद्वक्षोजकुम्भान्तरी॥
काश्मीरागरुवासिताङ्गरुचिरे काशीपुराधीश्वरी,
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥2॥
योगानन्दकरी रिपुक्षयकरी धर्मार्थनिष्ठाकरी,
चन्द्रार्कानलभासमानलहरी त्रैलोक्यरक्षाकरी॥
सर्वैश्वर्यसमस्तवाञ्छितकरी काशीपुराधीश्वरी,
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥3॥
कैलासाचलकन्दरालयकरी गौरी उमा शङ्करी,
कौमारी निगमार्थगोचरकरी ओङ्कारबीजाक्षरी॥
मोक्षद्वारकपाटपाटनकरी काशीपुराधीश्वरी,
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥4॥
दृश्यादृश्यविभूतिवाहनकरी ब्रह्माण्डभाण्डोदरी,
लीलानाटकसूत्रभेदनकरी विज्ञानदीपाङ्कुरी॥
श्रीविश्वेशमनःप्रसादनकरी काशीपुराधीश्वरी,
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥5॥
उर्वीसर्वजनेश्वरी भगवती मातान्नपूर्णेश्वरी,
वेणीनीलसमानकुन्तलहरी नित्यान्नदानेश्वरी॥
सर्वानन्दकरी सदा शुभकरी काशीपुराधीश्वरी,
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥6॥
आदिक्षान्तसमस्तवर्णनकरी शम्भोस्त्रिभावाकरी,
काश्मीरात्रिजलेश्वरी त्रिलहरी नित्याङ्कुरा शर्वरी॥
कामाकाङ्क्षकरी जनोदयकरी काशीपुराधीश्वरी,
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥7॥
देवी सर्वविचित्ररत्नरचिता दाक्षायणी सुन्दरी,
वामं स्वादुपयोधरप्रियकरी सौभाग्यमाहेश्वरी॥
भक्ताभीष्टकरी सदा शुभकरी काशीपुराधीश्वरी,
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥8॥
चन्द्रार्कानलकोटिकोटिसदृशा चन्द्रांशुबिम्बाधरी,
चन्द्रार्काग्निसमानकुन्तलधरी चन्द्रार्कवर्णेश्वरी॥
मालापुस्तकपाशासाङ्कुशधरी काशीपुराधीश्वरी,
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥9॥
क्षत्रत्राणकरी महाऽभयकरी माता कृपासागरी,
साक्षान्मोक्षकरी सदा शिवकरी विश्वेश्वरश्रीधरी॥
दक्षाक्रन्दकरी निरामयकरी काशीपुराधीश्वरी,
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥10॥
अन्नपूर्णे सदापूर्णे शङ्करप्राणवल्लभे॥
ज्ञानवैराग्यसिद्ध्यर्थं भिक्षां देहि च पार्वति ॥11॥
माता च पार्वती देवी पिता देवो महेश्वरः॥
बान्धवाः शिवभक्ताश्च स्वदेशो भुवनत्रयम् ॥12॥
॥ श्री शङ्कराचार्य कृतं ॥
इस स्तोत्र का नियमित पाठ करने से भक्तों के जीवन में कभी भी धन, अन्न या समृद्धि की कमी नहीं होती। माता अन्नपूर्णा के आशीर्वाद से सभी को समृद्धि, भोग और मोक्ष प्राप्त होता है। अतः इस स्तोत्र का नित्य पाठ करते हुए देवी से कृपा की प्रार्थना करनी चाहिए।
स्तोत्रम् के पाठ की विधि
इसका पाठ करने से माता अन्नपूर्णा की कृपा प्राप्त होती है, जिससे जीवन में अन्न, धन और समृद्धि का वास होता है। इस स्तोत्र के प्रभाव को संपूर्ण रूप से प्राप्त करने के लिए इसकी विधि को सही तरीके से अपनाना आवश्यक है।
- शुभ समय: पाठ प्रातःकाल या संध्या के समय शुद्ध अवस्था में करना चाहिए। शुक्रवार, पूर्णिमा और नवरात्रि के दिनों में इसका विशेष महत्त्व होता है।
- स्थान: पाठ के लिए किसी स्वच्छ और शांत स्थान का चयन करें, जहां कोई व्यवधान न हो।
- आवश्यक तैयारी: स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और माता अन्नपूर्णा की प्रतिमा या चित्र के समक्ष आसन लगाएं। एक दीपक जलाएं, धूप-दीप से पूजन करें और माता को नैवेद्य अर्पित करें। लाल या पीले फूल चढ़ाना शुभ माना जाता है।
- पाठ की प्रक्रिया: आरंभ में ॐ अन्नपूर्णायै नमः मंत्र का ११ बार जाप करें। इसके बाद, ध्यानपूर्वक अन्नपूर्णा स्तोत्रम् का पाठ करें। पाठ का उच्चारण स्पष्ट और शुद्ध होना चाहिए। यदि संभव हो तो इसे तीन बार दोहराएं।
- प्रार्थना और संकल्प: पाठ समाप्त होने के बाद माता अन्नपूर्णा से जीवन में कभी अन्न की कमी न होने की प्रार्थना करें। विशेष रूप से, जो लोग घर में सुख-समृद्धि की कामना करते हैं, उन्हें यह संकल्प लेना चाहिए कि वे कभी भी अन्न का अपमान नहीं करेंगे और अन्न का दान अवश्य करेंगे।
- समापन विधि: पाठ के उपरांत माता अन्नपूर्णा से प्रार्थना करें और श्रद्धापूर्वक आरती करें। अंत में, प्रसाद अर्पित करें और इसे परिवारजनों में बांटें। यदि संभव हो तो अन्नदान भी करें।
इस विधि से अन्नपूर्णा स्तोत्रम् का पाठ करने से माता अन्नपूर्णा की कृपा प्राप्त होती है और भक्त के जीवन में अन्न, धन और समृद्धि का स्थायी वास होता है।
FAQ
इस स्तोत्रम् का रचयिता कौन है?
इसके रचयिता आदि शंकराचार्य को माना जाता है।
क्या पाठ व्रत या उपवास के दौरान किया जा सकता है?
उत्तर: हाँ, इसे उपवास या व्रत के दौरान करना अत्यंत लाभकारी होता है।
इसके पाठ के दौरान कौन-सा भोग अर्पित करना चाहिए?
माता को खीर, चावल, गुड़, फल, घी से बने पकवान और दूध से बनी मिठाइयाँ अर्पित करना शुभ माना जाता है।
क्या स्तोत्रम् पाठ के बाद अन्नदान करना आवश्यक है?
यह अनिवार्य नहीं है, लेकिन यदि संभव हो तो अन्नदान अवश्य करें, क्योंकि माता अन्नपूर्णा को अन्न और दान से अत्यधिक प्रसन्नता होती है।
मैं श्रुति शास्त्री , एक समर्पित पुजारिन और लेखिका हूँ, मैं अपने हिन्दू देवी पर आध्यात्मिकता पर लेखन भी करती हूँ। हमारे द्वारा लिखें गए आर्टिकल भक्तों के लिए अत्यंत उपयोगी होते हैं, क्योंकि मैं देवी महिमा, पूजन विधि, स्तोत्र, मंत्र और भक्ति से जुड़ी कठिन जानकारी सरल भाषा में प्रदान करती हूँ। मेरी उद्देश्य भक्तों को देवी शक्ति के प्रति जागरूक करना और उन्हें आध्यात्मिक ऊर्जा से ओतप्रोत करना है।View Profile