कहाँ तू खोज रहा रे प्राणी तेरे मन मन्दिर में राम लिरिक्स

कहाँ तू खोज रहा रे प्राणी तेरे मन मन्दिर में राम यह भजन एक गहरी सिख देने वाली रचना है। इसमें यह बताया गया है कि भगवान राम कहीं बाहर नहीं, बल्कि हमारे भीतर हैं। हम अक्सर भगवान को मन्दिरों, मंदिरों और तीर्थ स्थलों में खोजते हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि राम का वास हमारे अंदर है। यह भजन हमसे आग्रह करता है कि हम अपनी आत्मा में राम को खोजें, क्योंकि वही हमारी सच्ची शरण है। राम के दर्शन के लिए किसी बाहरी स्थान की आवश्यकता नहीं है, बल्कि हमारे दिल की गहराई में उनका अस्तित्व छिपा है।

Kaha Tu Khoj Raha Re Prani Tere Man Mandir Me Ram

कहाँ तू खोज रहा रे प्राणी,
तेरे मन मन्दिर में राम…
नहीं अवध नहिं गोकुल में प्रभु,
नहीं द्वारका धाम…i
तेरे मन मन्दिर में राम।।

मन में तेरे मैल जमी है,
अँखियन मोह की पट्टी पड़ी है,
दीखत नाहीं राम…
तेरे मन मन्दिर में राम।।

एक बार तू प्रभु को भजले,
मन निर्मल को जाए…
धोले मन का मैल रे प्राणी,
ले कर हरि का नाम…
तेरे मन मन्दिर में राम।।

कहाँ तू खोज रहा रे प्राणी,
तेरे मन मन्दिर में राम…
नहीं अवध नहिं गोकुल में प्रभु,
नहीं द्वारका धाम…
तेरे मन मन्दिर में राम।।

कहाँ तू खोज रहा रे प्राणी तेरे मन मन्दिर में राम भजन हमें यह एहसास दिलाता है कि हम कहीं बाहर न जाकर, भीतर की शांति और भक्ति की ओर रुख करें। श्रीराम की भक्ति हर व्यक्ति के भीतर होती है, और अगर हम सही ढंग से ध्यान लगाएं, तो वही हमारे दिल में रहते हैं। जैसा कि राम के गीत सुनाते चलो हमें अपने जीवन को राम के नाम से रोशन करने की प्रेरणा देते हैं, वैसे ही इस भजन से हम सीखते हैं कि राम का दर्शन केवल अंदर से संभव है। जय श्रीराम!

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