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कुछ ना कहूंगा चुप ही रहूँगा

भक्ति का सबसे गहरा रूप वह होता है, जब शब्द मौन हो जाते हैं और आत्मा श्रीकृष्ण से संवाद करने लगती है। प्रेम और समर्पण में डूबा हुआ भक्त केवल अपने भावों से प्रभु को पुकारता है। भजन कुछ ना कहूंगा चुप ही रहूँगा इसी भाव को प्रकट करता है, जहाँ भक्त अपनी हर व्यथा और प्रेम को बिना बोले ही श्रीकृष्ण के चरणों में अर्पित कर देता है। आइए, इस भजन के मधुर स्वर में श्रीकृष्ण की दिव्य अनुभूति करें।

Kuch Na Kahunga Chup Hi Rahunga

कुछ ना कहूंगा,
चुप ही रहूँगा,
चुपचाप बैठे बाबा,
रोता रहूँगा।1।

ईशारे तेरे बाबा,
समझ ना पाऊं,
वक्त से पहले ही,
क्यु हार जाऊ,
किससे कहुंगा,
कहना सकेगा,
चुपचाप बैठे बाबा,
रोता रहूँगा।2।

बेचैनी को बाबा,
सहता रहूँगा,
दर पे तुम्हारे,
बैठा रहुगा,
दर्द सहुंगा,
कह ना सकुंगा,
चुपचाप बैठे बाबा,
रोता रहूँगा।3।

क्या मेरे कर्मों में,
तु भी नही है,
जो मैं पडा हूँ,
क्या वो सही है,
तुझसे कहुंगा,
छिपा ना सकुंगा,
चुपचाप बैठे बाबा,
रोता रहूँगा।4।

कुछ ना कहूंगा,
चुप ही रहूँगा,
चुपचाप बैठे बाबा,
रोता रहूँगा।5।

जब भक्ति गहराई तक पहुँच जाती है, तो शब्दों की आवश्यकता नहीं रहती—बस एक सच्चे हृदय की पुकार ही श्रीकृष्ण तक पहुँचने के लिए पर्याप्त होती है। ऐसे ही भजनों को पढ़ें और करें, जैसे मेरे मन के मंदिर में मूरत है श्याम की, दीनो के नाथ दीनानाथ हमारी सुध लो प्रभु जी, सुना है तेरे दर पे आके मोहन और राधे राधे जपो चले आएंगे बिहारी, जिससे श्रीकृष्ण की भक्ति और गहरी हो जाए। ????????

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