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वृंदा-विष्णु लांवा फेरे

भगवान विष्णु और माता तुलसी (वृंदा) का पावन संबंध भक्तों के लिए अद्भुत आस्था का प्रतीक है। तुलसी विवाह की परंपरा में श्रीहरि और वृंदा देवी के मिलन का उत्सव मनाया जाता है, जो भक्तों के लिए शुभता और मंगल का संदेश लाता है। वृंदा-विष्णु लांवा फेरे भजन हमें इस दिव्य विवाह की महिमा का अनुभव कराता है और हमें श्रीहरि की अनंत कृपा से जोड़ता है। आइए, इस भजन के माध्यम से भगवान विष्णु और माता तुलसी की पावन कथा का स्मरण करें।

Vrinda-Vishanu Lavaan Fere

वृंदा-विष्णु लांवा फेरे
धुन: रेश्मी सलवार ते कुर्ता जाली दा ।

बैठे दोनों सज-धज, नेड़े नेड़े ने।
होंण लगे वृंदा-विष्णु दे फेरे ने॥

इक सांवरा ते इक गोरी। बड़ी सुन्दर सोहनी जोडी॥
चर्चे इस जोड़ी दे चार चुफेरे ने – होंण लगे….

वृंदा वरमाला पाई। वृंदा वरयो हरिराई॥
बरसे रंग रस कलियां फुल बथेरे ने – होंण लगे…..

मंगल धुन वेदां गाई। हर वैदिक रीत निभाई॥
वर वधु ने लए वेदी दे फेरे ने – होंण लगे……

होई शगणां नाल विदाई। डोली बैकुंठ विच आई॥
गीत ‘‘मधुप’’ दे गूंजे चार चुफेरे ने – होंण लगे….. ।

श्रीहरि और माता तुलसी का यह दिव्य विवाह भक्तों को प्रेम, भक्ति और समर्पण का मार्ग दिखाता है। वृंदा-विष्णु लांवा फेरे भजन हमें यह सिखाता है कि भगवान विष्णु की कृपा पाने के लिए निष्कलंक प्रेम और श्रद्धा आवश्यक है। इस भक्ति भाव को और गहराई से अनुभव करने के लिए आप “श्री हरि की महिमा अपार , गोविंद बोलो हरि गोपाल बोलो , नारायण, नारायण जय गोविंद हरे” और “संकट हरन श्री विष्णु जी” जैसे अन्य भजनों का भी पाठ करें और भगवान विष्णु की अनंत महिमा का गुणगान करें। ????????

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