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कहाँ छुपे हो राम हमारे रो रो भरत जी राम पुकारे

जब भक्ति सच्ची होती है, तो हृदय से निकली पुकार सीधे प्रभु श्रीराम तक पहुंचती है। कहाँ छुपे हो राम हमारे, रो रो भरत जी राम पुकारे भजन उस प्रेम और विरह को दर्शाता है, जो भरत जी को अपने प्रिय बड़े भाई श्रीराम से था। यह केवल एक पुकार नहीं, बल्कि उस अटूट भक्ति और समर्पण का प्रतीक है, जो हर भक्त के हृदय में श्रीराम के प्रति होता है।

Kahan Chupe Ho Ram Hamare

कहाँ छुपे हो राम हमारे,
रो रो भरत जी राम पुकारे,
होंठ है सूखे प्यास के मारे,
कहां छुपे हों राम हमारे,
रो रो भरत जी राम पुकारे।1।

तुझ बिन अधूरा हूँ मैं,
प्राण गए क्यों तन से छोड़ के,
अवध भी लागे सुना,
जब से गए हो मुख मोड़ के,
अब मैं जियूँगा,
अब मैं जियूँगा किसके सहारे,
कहां छुपे हों राम हमारे,
रो रो भरत जी राम पुकारे।2।

अब तो महल भी लागे,
जैसे कोई शमसान है,
कल थी जहाँ खुशहाली,
आज लगे वीरान है,
क्या कुछ लिखा है,
क्या कुछ लिखा है भाग्य हमारे,
कहां छुपे हों राम हमारे,
रो रो भरत जी राम पुकारे।3।

कहाँ छुपे हो राम हमारे,
रो रो भरत जी राम पुकारे,
होंठ है सूखे प्यास के मारे,
कहां छुपे हों राम हमारे,
रो रो भरत जी राम पुकारे।4।

श्रीराम केवल नाम लेने से नहीं, बल्कि सच्चे मन से पुकारने से मिलते हैं। भरत जी की भक्ति हमें सिखाती है कि यदि हमारी श्रद्धा अटूट हो, तो प्रभु अवश्य हमारे हृदय में विराजमान हो जाते हैं। यदि यह भजन आपके मन में भक्ति की भावना को जागृत कर रहा है, तो आप “राम नाम की महिमा, श्रीरामचंद्र कृपालु भज मन, हनुमान जी के श्रीराम प्रेम की कथा, और “अवधपुरी में दीप जले हैं सिया संग मेरे राम चले हैं” जैसे अन्य भजन और लेख भी पढ़ सकते हैं। ???? जय श्रीराम! ????

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