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हे जननी मैं न जीऊं बिन राम

भक्ति का सबसे ऊँचा स्वरूप वही है जहाँ भक्त और भगवान के बीच कोई दूरी न रहे। हे जननी, मैं न जीऊं बिन राम भजन एक सच्चे भक्त की भावना को दर्शाता है, जो अपने प्राणों से भी अधिक श्रीराम को चाहता है। जब मनुष्य अपने जीवन में श्रीराम के बिना कुछ भी नहीं देखता, जब हर सांस, हर धड़कन केवल उनके नाम का स्मरण करती है, तब भक्ति अपने चरम पर होती है। यह भजन हमें श्रीराम के प्रति अटूट प्रेम और समर्पण का संदेश देता है।

Janani Main Na Jiu Bin Ram

दोहा –
राम ही तन में राम ही मन में,
रोम रोम में ही राम,
राम बिना मोरा जीवन सूना,
कैसे जीऊं बिन राम1।

हे जननी मैं न जीऊं बिन राम,
राम लखन सिया वन को गमन कीन्हो,
पिता गए सुरधाम,
जननी मैं न जियूं बिन राम।2।

होत भोर हमहूँ बन जइबे,
अवध अइहे केहि काम,
कपट कुटिल कुबुद्धि अभागिनी,
कौन हरयो तेरो ज्ञान,
जननी मैं न जियूं बिन राम।3।

सुर नर मुनि सब दोष देते है,
नहीं कियो भल कम,
तुलसीदास प्रभु आस चरण की,
भए विधाता वाम,
जननी मैं न जियूं बिन राम।4।

हे जननी मैं न जियूं बिन राम,
राम लखन सिया वन को गमन कीन्हो,
पिता गए सुरधाम,
जननी मैं न जियूं बिन राम।5।

श्रीराम जी के बिना जीवन अधूरा है, और सच्चा सुख केवल उनकी भक्ति में ही प्राप्त होता है। जब मन पूरी तरह श्रीराम के चरणों में समर्पित हो जाता है, तब जीवन सार्थक हो जाता है। यह भजन हमें राम नाम में लीन होने और भक्ति के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। यदि आपको यह भजन प्रिय लगा, तो आप “श्रीरामचंद्र कृपालु भज मन, राम नाम की महिमा, श्रीराम के वनवास की कथा, और “हनुमान जी के श्रीराम प्रेम की कथा” भी पढ़ सकते हैं। इन भजनों और लेखों से आपकी भक्ति और अधिक गहरी होगी। ???? जय श्रीराम! ????

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